मूर्खों के देश में सरकार से कैसी अपेक्षा ? यथा प्रजा तथा राजा ही तो हैं ! 

मेरी पीड़ा प्रतिबिंबित होती है कठोर हैडलाइन में ! यकीन मानिये देशवासियों को "मूर्खों" सरीखे अनुचित रूपक से नवाजने की हिम्मत मुझे आज सुप्रीम कोर्ट के इलेक्शन कमीशन की मद्रास हाईकोर्ट  के खिलाफ दायर की गयी याचिका के खारिज किये जाने के निर्णय से ही मिली ! हालांकि इसी पीड़ा के वशीभूत होकर प्रसिद्ध एक्टिविस्ट बर्नार्ड शॉ ने महान अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन को भी सही किया था - (Democracy is a government) of the fools, for the fools, by the fools.   

लेकिन मैं ना तो बर्नार्ड शॉ जैसी शख्सियत रखता हूँ और ना ही वो समय है सो भगवान मुझे लिंचिंग से बचा लेना मूर्खों को आईना दिखाने की जुर्रत जो  कर बैठा हूँ ! वैसे मेरे टाइटल का कैविएट मै खुद ही फाइल कर देता हूँ - अपवाद स्वरूप बुद्धिमान लोग हैं प्रजा में भी और सरकार में भी ! फिर स्वयंभू  बुद्धिजीवियों की कमी थोड़े ना है हमारे देश में - खासकर नेता तो सब के सब  जब देखो ट्वीटियाते रहते हैं ! 

 "मास्क पहनना, दोगज की दूरी रखना और बार बार हाथ धोना" यदि अब भी आदत में शुमार नहीं हुआ तो लोगों को मूर्ख ना कहें तो क्या कहें ? अब देखिये गुजरात के साणंद का मंजर ! रवाना कर दी गयी गाजे बाजे के साथ सिर पर कलश लिए हजारों महिलाएं बिना मास्क के मंदिर की ओर पता नहीं कौन से देवता को जल चढ़ाने के लिए ! चूँकि  यहाँ पर पिछले १५ दिनों से कोरोना का एक भी केस नहीं बताया गया था तो किसी धर्म के ठेकेदार मूर्खाधिराज ने आह्वान कर दिया देवता  के जलाभिषेक का ! उधर हैदराबाद के चारमीनार इलाके में किसे परवाह है कोविड १९ प्रोटोकॉल की ? ईद की खरीदारी टॉप प्रायोरिटी जो है ! 

कोरोना प्रोटोकॉल की प्रासंगिकता सुविधानुसार सेलेक्टिव है, मकसद अपना एजेंडा सिद्ध होने से है ! किसी का एजेंडा तब्लीगी जमात से सफल हुआ था तो किसी का आज कुंभ मेला से हो रहा है; मूल में सोशल डिस्टेंसिंग कॉमन है ! तो सोशल डिस्टेंसिंग के लिए भीड़ पर साडा कुत्ता कुत्ता तुहाडा कुत्ता टॉमी लागू है ! अब देखिये ना आज ही लाफ्टर चैलेंजर और कपिल शर्मा शो फेम कॉमेडियन सुगंधा मिश्रा अपनी शादी में  कोविड प्रोटोकॉल के उल्लंघन के लिए पंजाब के जालंधर में बुक कर दी गयी जबकि रोज किसान अपने धरना प्रदर्शनों, मीटिंगों में सोशल डिस्टन्सिंग की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं, उन्हें इम्युनिटी जो मिली हुई है सुप्रीम कोर्ट से भी ! पंजाब सरकार ने भी उन्हें इम्युनिटी दे दी है , आखिर वोट चाहिए ना ! दरअसल सुगंधा पर मामला बनाने के पीछे की कहानी दूसरी है और वह है उसके दूल्हे संकेत भोसले ने राहुल गांधी पर मिमिक्री जो की थी !   

 माना आस्था है ,श्रद्धा है, भक्ति है लेकिन जब कोरोना प्रोटोकॉल लागू है तब क्या इन भावों का प्रदर्शन जरूरी है ?  पहली लहर के बाद की लापरवाहियों ने ही कोरोना रूपी रावण को ऐसा जीवित किया कि अपने दशावतार ( अनेकों वैरिएंट्स,म्यूटेंट्स)  में आ गया है और तांडव रुका कहाँ हैं ? अब तो कहा जा रहा है तीसरी लहर भी आएगी और बच्चों को भी नहीं बख्शेगी ! 

रोजाना रिपोर्ट किये जा रहे मामले ४ लाख पार कर चुके हैं जबकि पता नहीं कितने रिपोर्ट भी नहीं हो पा रहे होंगे ! मरने वालों का आंकड़ा ४००० पार है जबकि वे तो आंकड़ों में दर्ज ही नहीं होते जो पोस्ट कोरोना सिम्पटम्स या सिंड्रोम की वजह से मर रहे हैं ! आखिर एक स्टडी इस बावत भी तो आयी थी कि कोरोना से ठीक होने वाले हर ८ आदमियों में से एक बदनसीब छह महीनों में काल का ग्रास बन रहा है !  

 कोरोना वायरस एक पैन वर्ल्ड महामारी है ! सच कहें तो इसका आचरण , प्रकोप और रूप साइंटिस्ट्स और  रिसर्चर्स के लिए अभी भी पजल ही है, पहेली है ! नित नई नई फाइंडिंग्स आ रही है या कहें तो खुलासे हो रहे हैं ! सच्चाई तो यही है कि भरसक प्रयासों के बावजूद दुनिया प्रिवेंशन के लिए सिर्फ प्रीकॉशन्स भर तय कर पायी हैं ! जहाँ तक इलाज से क्योर करने की बात हैं तो सौ फीसदी गारंटी ना तो किसी सेट ऑफ़ ट्रीटमेंट से है ना ही टीकाकरण से हैं ! सभी आंकड़ों में उलझ रहे हैं और उलझा भी रहे हैं मसलन रिकवरी रेट, मोर्टेलिटी रेट, एफ्फिकेसी आदि आदि ! अब तो ये भी तय हो चला है वैक्सीन ले ली तो भी कोरोना हो सकता है लेकिन माइल्ड रहेगा ! 

कुल मिलाकर दुनिया के सभी देशों की विपत्ति कॉमन है तो सभी मुकाबला भी कर रहे हैं लेकिन एक बड़ा फर्क है भारत और तक़रीबन अन्य सभी देशों के सिनेरियो में ! डेमोक्रेसी तो दुनिया के अधिकांश देशों में हैं लेकिन भारत से डिफरेंट हैं ! वहां महामारी हर देश के लिए राष्ट्रीय विपदा है और विपक्ष कंस्ट्रक्टिवली क्रिटिकल होते हुए सरकार के साथ है ! परस्पर  ब्लेम गेम वे भी खूब खेलेंगे लेकिन चुनाव के मैदान में ! वहां पार्टियां अपने वोटरों को मूर्ख नहीं समझती ! वे भलीभांति जानते हैं कि जनता को बरगलाया नहीं जा सकता ! इसके विपरीत हमारे देश में कोरोना को विपक्ष ने सरकार की विपदा बना दिया है ! परस्पर ब्लेम गेम निम्नतम स्तर पर है और पूरे सिस्टम की ऊर्जा एक दूसरे को नीचा दिखाने में लगी हुई है ! कहने में हर्ज ही नहीं है कि न्यायपालिका और मीडिया भी इसी ब्लेम गेम में उलझ गए हैं !  संयम सब खो चुके हैं ; हाँ, उपदेश दूसरे को संयम रखने का जरूर देते हैं !  अब तो न्यायलयों के सुर भी केंद्र सरकार की खिलाफत कर रहे हैं ! केंद्र की हर कमेटी, हर ऑफिसर नकारा है ; ऑक्सीजन सप्लाई लीगल बन गयी है; हमने कह दिया ७०० टन दिल्ली को देना है, आप कुछ भी करो ! वैसे दिल्ली उच्च न्यायालय पहले कह ही चुका है आप चोरी करो , डाका डालो , कुछ भी करो ! और जब साथी न्यायालय से बल मिला तो मद्रास हाई कोर्ट ने कह दिया इलेक्शन कमीशन के अफसरों पर मर्डर की कार्यवाही होनी चाहिए ! शब्द अनुचित हैं , कड़े हैं , बचना चाहिए लेकिन एक्शन इसलिए नहीं होगा चूँकि उनका फ़्रस्ट्रैशन है, आक्रोश है, पीड़ा है  ! तो छूट मिल गयी ना मीडिया को, विपक्ष को भी ! सीरम के पूनावाला को भी पीड़ा में आकर ही धमका दिया ना कतिपय मुख्यमंत्रियों ने ! अवमानना सिर्फ कोर्ट की जो होती है ! अच्छा तो रहेगा मोदी सरकार सत्ता सुप्रीम कोर्ट को सौंप दें और सुप्रीम कोर्ट तमाम राज्य सरकारों का अधिग्रहण कर उच्च न्यायालयों को सौंप दें !     

इतनी ऊर्जा यदि विपक्ष, न्यायालय , सरकार और मीडिया ने लोगों के साथ लगाई होती तो देश में समस्या विकराल होती ही नहीं खासकर इसलिए कि यहाँ लोगों की इम्यूनिटी दुनिया के अन्य देशों के लोगों की तुलना में निर्विवाद रूप से बेहतर है ! क्यों चुनाव हुए ? इलेक्शन कमीशन ने घोषणा की तो अदालतों ने तब रोका क्यों नहीं ? कम से कम मर्डर का आरोप तो नहीं लगता ! राजनीतिक पार्टियों ने रैलियां क्यों की ? और की तो जनता क्यों गयी ? कुंभ क्यों हुआ ? किसान आंदोलन क्यों हो रहा है और जब मामला लंबित है तो भी उच्चतम न्यायालय इस क्राइसिस में भी दिल्ली बॉर्डर पर किसानों का जमावड़ा क्यों बर्दास्त कर रही है ? और सरकार तो कुछ अच्छा कर ही नहीं सकती चूँकि मूर्खों ने जो वोट दिया था !  

"क्यों" का जवाब किसी के पास नहीं हैं ! होना भी नहीं चाहिए ! जवाब मिला नहीं  कि कोरोना ख़त्म हुआ समझो  ! और कोरोना खत्म हुआ तो ऑक्सीजन, रेमडेसिवीर, वेंटिलेटर, वैक्सीन आदि आदि सब मुद्दे ही गायब हो जाएंगे राजनीति करने के लिए !  

बचपन में एक कहानी पढ़ी थी - An Everlasting Story ! ऐसी ही कहानी है  बिना किसी कोड ऑफ़ कंडक्ट वाले हमारे देश की ! तो अंत करें इस कहानी का लेकिन फिर भी एक दो पारा और आप झेल ही सकते हैं ! 

बात की मैंने कोड ऑफ़ कंडक्ट की तो सबसे पहले लोगों  के लिए बात कर लें ! आज जो कोरोना क्राइसिस है शायद कभी किसी ने देखी तो क्या सुनी भी नहीं होगी ! अब ये मत कहिएगा कि फिल्मों में तो देखी है ! अनिश्चितता के माहौल में कोविड एप्रोप्रियेट बिहेवियर ही उनका कोड ऑफ़ कंडक्ट है और अब तो लांसेट ने भी कह दिया है लॉक डाउन की जरुरत नहीं हैं जरुरत दस आदमियों से ज्यादा इकट्ठे होने से हैं ! तो भई ! छोड़ों मूर्खों वाली हरकतें ! मैयत में बीस भी क्यों ? कल बचोगे ही नहीं तो किसकी मैयत में जा पाओगे ? भारतेन्दु हरिश्चंद्र का सुप्रसिद्ध नाटक सत्यवादी हरिश्चंद्र याद आ रहा है - मरनो भलो विदेश को जहां ना अपुनो कोय ; माटी खाय जनावरा महोच्छव होय ! भगवान ना करे वो नौबत किसी के लिए भी आये ! शादी- विवाह , जनेऊ आदि अभी हो ही क्यों ? त्योहारों की खरीदारी का भी कोई औचित्य नहीं हैं ! मंदिर हो या मस्जिद हो या अन्य कोई धार्मिक स्थल हो ; सारे के कपाट बंद ही रखें !   

अब आएं नेताओं पर ! एक सूत्री कोड ऑफ़ कंडक्ट है उनके लिए  - फॉर गॉड शेक नो मोर ब्लेम गेम ! मीडिया की बात करें तो बंद करें पॉलिटिकल डिस्कोर्स , प्राइम टाइम दंगल आदि ! नो लेफ्ट नो राइट बट स्ट्रैट ओनली ! अतिरंजना बिल्कुल बंद करें ; कहने का मतलब श्मशानों से लाइव रिपोर्टिंग, हॉस्पिटलों से लाइव रिपोर्टिंग, रोने बिलखने की लाइव रिपोर्टिंग ! सब  हकीकत से वाकिफ हैं ! चर्चा कीजिये प्रयासों की, अच्छी चीजें जो हो रही हैं उनकी , मददगारों की ताकि लोग ऑप्टिमिस्टिक हों ! उन्हें निराशा के सागर में ना झोंके ! नेताओं, एक्टिविस्टों की बेसिर पैर और अनुचित बातों को हाईलाइट ना करें और ना ही किसी भी टिप्पणी का पोस्टमार्टम करें ! जो जैसा है वैसा दिखा दें, नुक्ताचीनी बंद ! महामहिम को हम क्या सलाह दें ? छोटे मुंह बड़ी बात होगी ! वैसी टिप्पणियां ही क्यों हो जो अनुचित है , ना की जाने लायक है ! संयम और अनुशासन आपसे ही तो सीखा जाता है ! निज पर शासन फिर अनुशासन !     

अंत में वैक्सीन पर थोड़ी सी चर्चा कर लें ! दिसंबर २०२० में शायद इंग्लैंड से शुरुआत हुई थी और अभी तक सिर्फ २९ करोड़ लोग ही पूरी तरह से वॅक्सिनेटेड हैं यानि दोनों डोजेज ले पाए हैं ! भारत में मार्च में टीकाकरण की शुरुआत हुई थी और अब तक कुल १६.३ करोड़ डोजेज दिए गए हैं जिनमें से सिर्फ ३.१५ करोड़ लोगों ने ही दोनों डोजेज ली हैं ! मासिक उत्पादन १० करोड़ अधिकतम है , स्पुतनिक कुछ आएँगी और इस हिसाब से भारत की अस्सी करोड़ जनता का पूर्ण टीकाकरण होते होते मार्च २०२२ आ जाएगा ! आज सारे दुनिया के मैन्युफैक्चरर भी वैक्सीन देने लगें भारत को तो भी अक्टूबर २०२१ आ जाएगी जब हम कह पाएंगे कि हमने अपनी जनता को वैक्सीनेटेड कर दिया है लेकिन वो अभी दूर की कौड़ी है !  समझ लीजिये देश किस बेसिर पैर की बहस में उलझा हैं ? प्रयास अभी सिर्फ यही होना चाहिए कि ऐसा इकोसिस्टम बनाया जाय कि वक्सीनशन सेंटरों पर भीड़ ना हों और  जितने भी लोगों को वैक्सीन मिले इजी गोइंग मिलें ! प्रायोरिटी उन एरिया को दी जाय जहाँ संक्रमण ज्यादा है ! जहां तक फ्री का सवाल है, यूनिवर्सल बिलकुल नहीं होना चाहिए ! इसमें कॉर्पोरेट्स , एनजीओ, रिलीजियस ट्रस्ट्स आदि सब कंट्रीब्यूट करें ! कंट्रीब्यूट कर भी रहे हैं तभी तो कल मुझे राज्य सरकार की संस्था एनकेडीए द्वारा  कोलकाता के न्यूटाउन में द्वारे (रेजिडेंशियल हाउसिंग काम्प्लेक्स) आकर दूसरी डोज दे दी गयी ! 

फिर कोविड टीकाकरण के लिमिटेशंस भी समझने की जरुरत है ! आप लाइन लगवाकर सैंकड़ों हजारों लोगों को टीका नहीं दे सकते ! क्योंकि सोशल डिस्टैन्सिंग का पालन करना है, टीका लगाने के बाद आधा घंटे के लिए व्यक्ति को ऑब्जरवेशन में भी रखना है ! मेडिकल स्टाफ की उपलब्धता भी एक फैक्टर है, वैक्सीन वायलस के लिए कोल्ड चैन की भी अनिवार्यता है ! कुल मिलाकर स्ट्रेटेजी "SLOW & STEADY WINS THE RACE " काम करेगी !

सौ बातों की एक ही बात है और वह है help each other, care for each other and protect each other ! और समझ लें, जैसा सदगुरु ने कहा भी है चूँकि कटु सच्चाई यही है !  

अब अंत में हमें भी अपने कोरोना सर्टिफिकेट पर मोदी जी की फोटो से एतराज है ! यदि कोई लॉजिक देता है कि करेंसी पर महात्मा गाँधी की फोटो है या कुछ और, सब बेमानी है , औचित्यहीन है !

वैसे जानकारी दे दूँ सबसे पहले महात्मा गांधी की तस्वीर भारतीय नोट पर सन १९६९ में आई थी। यह साल उनका जन्म शताब्दी का था। किंग जॉर्ज की फोटो वाला नोट १९४९ तक चलन में था और  इसके बाद अशोक स्तंभ वाला नोट आया था। और महात्मा गांधी वाले कागजी नोटों की शुरुआत १९९६ से शुरू हुई, जो अब तक चलन में है !  किसे एतराज हो सकता है ? बेहूदों की बात मत कीजियेगा ! निःसंदेह मोदी जी प्रधानमंत्री हैं, लेकिन उनका ग्लोरिफिकेशन यूँ उनके जीवनकाल में किया जाना अतिरंजना ही है ! याद कीजिये २००४ का बीजेपी का चुनाव प्रचार ! तब इलेक्शन कमीशन के आदेश से तमाम नेशनल हाईवे पर उनकी तस्वीर वाली होर्डिंग्स को पोत दिया गया था ! उनकी हार का एक महत्वपूर्ण कारण प्रचार तंत्र की अतिरंजना भी थी ! और आज शायद वही लॉजिक बंगाल में भी ममता दीदी के लिए कंट्रीब्यूट कर गया ! 

और अब अंत ही कर रहा हूँ इन्हीं शब्दों के साथ कि बातें निकलती गयी और मैं भटककर दूर निकलता चला गया !  क्षमा करें लेकिन पूरा पढ़ने के बाद ! 

Write a comment ...

Prakash Jain

Show your support

As a passionate exclusive scrollstack writer, if you read and find my work with difference, please support me.

Recent Supporters

Write a comment ...