गलत को सही करने के लिए बुलडोज़ करना सरकार की मनमानी है !

क्योंकि निष्कर्ष तो यही है कि यूपी सरकार ने मनमानी तो की पर गलत नहीं किया ! यूपी विकास प्राधिकरण ने मार्च 2021 में कुछ लोगों के अवैध निर्माण को बुलडोज कर दिया था. जिनके ढहाए, एक वकील था , दूसरा प्रोफेसर था, दो विधवाएँ थी और एक अन्य शख्स था. सारे मुस्लिम थे और इस विध्वंस के खिलाफ उनका तर्क था कि पूर्वाग्रह से ग्रस्त राज्य सरकार ने जमीन के हिस्से को गैंगस्टर अतीक अहमद का मानकर शनिवार देर रात नोटिस जारी किए और अगले ही दिन घरों को गिरा दिया गया. जबकि उत्तर प्रदेश सरकार ने तर्क दिया कि ये संरचनाएं अवैध थीं और निवासी अपने पट्टे की अवधि समाप्त होने के बाद भी वहां रह रहे थे. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पहले राज्य सरकार के इस तर्क को स्वीकार करते हुए कि उनका पट्टा 1996 में समाप्त हो गया था और उनके फ्री होल्ड आवेदन 2015 और 2019 में अस्वीकृत कर दिए गए थे, याचिकाकर्ताओं की चुनौती को खारिज कर दिया था. 
अंततः शीर्ष न्यायालय ने सिर्फ ढहाने की प्रक्रिया को प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध बताते हुए अवैध ठहराया है. चूंकि प्रक्रिया का उल्लंघन किया गया, सजा तो बनती थी. न्यायोचित बात होती यदि शीर्ष अदालत अपील कर्ताओं को अपने घरों के पुनर्निर्माण की अनुमति इस शर्त पर देने, कि वे अपीलों के खारिज होने की अवस्था में अपने खर्च पर संरचनाओं को गिरा देंगे, के पूर्व के विचार पर कायम रहती ! 
अपील कर्ताओं को पता था हश्र कि उनकी अपीलें खारिज होगी क्योंकि जमीन पर मालिकाना हक़ है नहीं ! सो उन्होंने पुनर्निर्माण के लिए वित्तीय साधनों का अभाव बताते हुए मुआवजे की मांग की. फिर वैकल्पिक आवास तो थे ही उनके पास ! उचित प्रक्रिया मसलन नोटिस देने, जवाब देने आदि से वंचित रखने के लिए मुआवजे के रूप में धन मिल जाए, वे यही चाहते थे ! और उनकी मुराद पूरी हो गई जब शीर्ष न्यायालय ने 10 लाख प्रति अपील कर्ता की मुआवजा राशि यह कहकर तय कर दी कि अधिकारियों को जवाबदेह ठहराने का एकमात्र यही तरीका है. प्राधिकरण हमेशा उचित प्रक्रिया का पालन करना याद रखेगा. 

शीर्ष न्यायालय ने एक प्रकार से सरकार को अपनी ही जमीन को खाली कराने की सजा इसलिए दे दी कि उसने प्रक्रिया को दरकिनार कर ऐसा किया ! क्या उचित नहीं होता यदि शीर्ष अदालत अपील कर्ताओं को भी अवैध कब्जे के लिए कड़ी फटकार लगा देती और साथ ही मुआवजा प्रतीकात्मक होता भारी भरकम नहीं ? आखिरकार अदालत ने भी तो नोटिस देने और विध्वंस करने की प्रक्रिया को नियंत्रित करने के दिशा निर्देश कालांतर में नवम्बर 2024 में दिए थे, सो इतना कठोर होने की ज़रूरत थी क्या ?  

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Prakash Jain

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